१८ मी सतब्दि रजत जयंती महोत्सव सहअस्ट्रचंडी महायज्ञ २००९ ( ज़्यादा माहिती के लिए क्लिक कीजिए )
 
माताजी में मनाए जाने वाले उत्सव
बेसतु वर्ष (नया साल)
प्रत्येक कार्तिक शुल्क के प्रथम दिन सुबह से ही लोग माताजी के दर्शन के लिए आते है और दर्शन कर नए वर्ष की शुरुआत करते है। यात्रियों की यह भीड़ कार्तिक शुल्क पक्ष मंचमी – लाभ पांचम तक रहती है।

अन्नकुट
मार्गशीर्ष शुल्क 8 के दिल ईसवी संवत 1976 में मनाया गया 18 वी शताब्दी महोत्सव के याद में अन्नकुट होता है। माताजी को इस दिन छप्पन भोग चढ़ाया जाता है।

 

वसंत पंचमी
महासुद पांचम के दिन माताजी का पाटोत्सव मनाया जाता है। विशाल मेला लगता है। यात्री दूर दूर से दर्शन के लिए आते है। इस दिन से बसंत के आगमन के कारण माताजी को केसु के लाल फूल से रंगा लाल पाढ़ वाली सफेद साड़ी जिसे वसनीयु भी कहते है, पहनाया जाता है। यह साडी महासुद 5 से फागुन सुद 5 (रंग पंचमी) तक पहनाया जाता है। इस दिन किसान खेती के सारे काम को बंद रखते है।

वैशाखी पूर्णिमा
इस दिन माँ उमिया की शोभायात्रा ऊंझा नगर में घुमती है। इस दिन ऊंझा में छुट्टी होती है। चांदी के रथ में पूरे गाजे बाजे के साथ माँ उमिया पूरे नगर में घुमती है। इसमें बूढ़े बच्चे सभी भाग लेते है। शोभायात्रा में कई झाँकियां भी होती है।

नवरात्री महोत्सव
माँ उमिया के चाचर चौक में नौ दिन अलग अलग रास गरबा मंडली के द्वारा गरबा का आयोजन किया जाता है। आश्विन शुक्ल 1 से 9 तक घट स्थापन होता है। उपवास, अनुष्ठान होता है और माताजी की षोड्सोपचार पूजा होती है। रोज चंडीपाठ होता है। आँठवे दिन नवचंडी हवन होता है तथा नौंवे दिन माताजी की पल्ली भरी जाती है। उत्सव के कारण माताजी का विशेष शृंगार भी होता है। शरद पूर्णिमा के दिन दूघ-पौंआ का भोग लगाया जाता है। आश्विन कृष्ण 13 धनतेरस के एक दिन माताजी कमल के उपर विराजती है और लक्ष्मी के रूप में दर्शन देती है। आश्विन कृष्ण 14 काली चौदस के दिन माँ चंडी काली के स्वरूप में सिंह के वाहन पर विराजती है। उस दिन माँ के बाल खुले रखे जाते है तथा तांत्रिक-साधक-उपासक के रात की पूजा के लिए शयन आरती नहीं कि जाती। इसी तरह शिवरात्री तथा जन्माष्टमी जैसे उत्सव के दिलन भी रात्रि पूजन की महिमा होने के कारण शयन आरती नहीं होती। पूनम के उत्सव के दिलन माताजी नंदी पर सवारी करती है।

माताजी की सात दिन की सात सवारी
माँ उमिया आदिशक्ति जगतजननी तथा भगवान शिव की अर्धांगनी है। वे सौम्य मूर्ति है तथा शिव के क्रोध को शांत कर सकती है। वे शक्ति संप्रदाय में अन्नपूर्णा के रूप में पूजी जाती है। वे जगतजननी है इसलिए प्रति दिन अलग अलग स्वरूप में उनकी पूजा होती है और वे हर दिन अलग अलग वाहन पर बिराजती है।

सोमवार – नंदी की सवारी – माँ उमा पार्वती के रूप में
मंगलवार – मयूर की सवारी – माँ सरस्वती के रूप में
बुधवार – सिंह की सवारी – माँ चंडी दुर्गा के रूप में
गुरुवार – गजराजा के सवारी – माँ लक्ष्मी के रूप में
शुक्रवार – मुर्गे की सवारी – माँ बाला त्रिपुरा सुंदरी बहुचराजी के स्वरूप में
शनिवार – ऐरावत हाथी की सवारी – माँ वैभव लक्ष्मी – इन्द्री के रूप में
रविवार – बाघ की सवारी – माँ अंबिका के स्वरूप में
यज्ञ
माताजी के हर दिन दो हवन होते है। दोनों हवन का बारह महिने की तिथि का पंजीयन हो गया है। तिथि के पंजीयन के अनुसार हवनविधि में बैठने के लिए यजमान को जानकारी दी जाती है।

सदाव्रत प्रवृत्ति
माताजी में प्रतिदिन दोपहर भोग लगाने के बाद सदाव्रत में आगंतुकों को खाना खिलाया जाता है। सदाव्रत के लिए 1000 रूपए जमा कर तिथि का पंजीय कराया जा सकता है।

18वी शताब्दी महोत्सव
राजा व्रजपाल ने संवत 212 ईसवी संवत 156 में माँ उमिया की प्राण प्रतिष्ठा कर मंदिर बनवाया था। इस बात को 18 सदी बीत गई। शास्त्र के अनुसार मूर्ति की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने पर पुनः प्राण प्रतिष्ठा की जानी चाहिए। इस कारण मां उमियाधाम ऊंझा में तारीख 23.11.1976 से 29.11.1976 तक 18 वी शताब्दी महोत्सव का आयोजन किया गया।

अभूतपूर्व से मनाए गए इस महोत्सव में 18 से 20 लाख दर्शनार्थी आए। कडवा पाटीदार समाज का दर्शन मेला लगा। ऊंझा के लोगों ने दिनरात एक कर तन मन धन से मेहनत की और इस महोत्सव को सफल बनाया। महोत्सव के पाँच दिनों में यहाँ कोई भी अप्रिय घटना नहीं बनी। यह एक ऐतिहासिक प्रसंग था।

इस महोत्सव के यज्ञ मुख्य आचार्य नडियाद के विद्वान पंडित अग्निहोत्री श्री शुकदेवजी महाराज थे। मुख्य यजमान स्वर्गीय सोमाभाई शंकरदास पटेल मोल्लोत तथा ध्वजा लगाने वाले स्वर्गीय बालचंददास उमेददास पटेल थे। महोत्सव की काफी प्रशंसा हुई तथा इसे सफल बनाने में रेलवे, एसटी, सरकारी कार्यालय, पुलिस विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पत्रकार, सूचना प्रसारण विभाग ने पूरा सहयोग दिया। ऐसा कहा जा सकता है कि माँ उमिया के दिव्य और अदभुत शक्ति के कारण यह महोत्सव संपन्न हुआ।

जब काम शुरु हुआ तब ट्रस्ट के पास मात्र 6 लाख रूपए ही थे और यह चिंता थी कि कार्य पूरा कैसे होगा। लोगों ने माताजी के चरणों में 52 लाख रूपए रख दिलए जिसमें से 8 लाख रूपए ही खर्च हुए तथा 44 लाख रूपए बच गए।

 
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