महोत्सव के बाद का माताजी संस्थान –
18वी शताब्दी महोत्सव के बाद श्री उमिया माताजी संस्थान ऊंझा सभी कडवा पाटीदार समाज के लिए आस्था और श्रद्धा का केन्द्र बना। संस्थान के कार्यकर्ताओं ने धर्म के साथ समाज की भलाई को अपना फर्ज माना जिससे समाज के विकास के लिए विभिन्न प्रवृत्ति पर विचार हुआ।
सबसे पहले इस महोत्सव के एकत्र धनराशि का उपयोग यात्री सुविधा के लिए किए जाने पर विचार हुआ। ईसवी संवत 1977-78 में आधुनिक सुविधायुक्त पथिकाश्रम और भोजनालय माताजी परिसर में बनाया गया। इसका उद्घाटन 17-5-78 को शेठ शरी हरिप्रसाद दुर्गाप्रसाद लश्करी के हाथों हुआ। पथिकाश्रम में 36 कमरे, 3 स्टोर रूम, एक सभा होल और एक बडा होल तैयार कराया गया। भोजनालय में एक साथ 400 यात्रियों के बैठ कर खाने की व्यवस्था की गई। भोजन गैस चुल्हा से बनाने की भी व्यवस्था हुई। साथ ही मंदिर में चांदी का मटका, गुल्लक तथा भगवान घर का दरवाजा बनाया गया। चांदी का दरवाजा 369 किलो चांदी से बनाया गया।
टावर के बगल में 17 लाख के खर्च से भव्य कार्यालय बनाया गया। उसके उपर यात्रियों के ठहरने के लिए 12 कमरे और एक सभा होल बनाया गया। माताजी के दक्षिण भाग में एक सत्संग होल भी बनाया गया। दान में दी गई जमीन के बदले सत्संग होल पर पटेल तलशीदास जोरदार रुसात का नाम लिखा गया।
इसके बाद मानसरोवर पर यात्रियों के लिए अलग 30 कमरे बनाए गए, जिसमें से तीन में एसी की सुविधा है। इसके अलावा अंबाजी, बहुचराजी और सोला अहमदाबाद में पथिकाश्रम बनाया गया।
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