१८ मी सतब्दि रजत जयंती महोत्सव सहअस्ट्रचंडी महायज्ञ २००९ ( ज़्यादा माहिती के लिए क्लिक कीजिए )
 
श्री उमिया माताजी संस्थान का 18वीं शताब्दी महोत्सव का फल
राजा व्रजपाल सिंह ने ईसवी संवत 156 संवत 212 में मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करने के 1800 वर्ष बाद मूर्ति में नया जीवन डालने के लिए शास्त्रोक्त रूप से पुनः प्राण प्रतिष्ठा करने का विचार किया गया। इस पर अमल कर 18वीं शताब्दी महोत्सव तारीख 23.11.1976 से 29.11.1976 तक मनाया गया। इसमें करीब 18 दर्शनार्थी आए। ऊंझा के लोगों ने अपनी मेहनत से इस महोत्सव को सफल बनाा जो एक ऐतिहासिक प्रसंग बना। सरकारी तंत्र, अखबार, रेडियो सभी का अच्छा सहयोग मिला।
इस महोत्सव के मुख्य यजमान स्वर्गीय सोमाभाई शंकरदास पटेल मोल्लोत ऊंझा वाले थे। विजयध्वज स्वर्गीय बालचंददास उमेददास पटेल के हाथों लगाया गया। महोत्सव में यज्ञ के मुख्य आचार्य नडियाद के विद्वान पंडित अग्निहोत्री श्री शुकदेवजी महाराज थे।

महोत्सव शुरु करकते समय संस्था के पास मात्र छह लाख रूपए थे। समाज ने माँ के चरणों में बावन लाख रूपए रख दिए जिसमें से आठ लाख खर्च हुए और चौवालिस लाख बच गए।

महोत्सव के बाद का माताजी का संस्था:-
18वीं शताब्दी महोत्सव से पाटीदार समाज एख बना। माताजी का स्थान समाज के लिए आस्था और श्रद्धा का केन्द्र बना। समाजके विकास के लिए तथा यात्रियों की सुविधा के लिए विचार किया गया। यात्रियों के लिए यहाँ आधुनिक सुविधायुक्त पथिकाश्रम और भोजनालय बना। मंदिर में चांदी का मटका, गुल्लक, देवस्थान का दरवाजा बनाया गया। सत्संग होल की जमीन तलसीदास जोरदास रूसा पटेल द्वारा दान में देने के कारण वहाँ पर उनका नाम जुडा। अंबाजी, बहुचराजी तथा सोला - अहमदाबाद में भी पथिकाश्रम बनाया गया।

श्री उमिया माताजी समाज कल्याण देवी के रूप में -
माँ उमिया के दर्शन के लिए अधिक से अधिक लोग आने लगे। दान और भेट बढने लगी। माँ उमिया के आशीर्वाद से समाज विकास की और बढने लगा। समाज में पिछड़ गए लोगों के विकास के लिए विचार किया गया। इसे धर्म का काम समझ कर संविधान में समाज विकास का कार्य करने को शामिल कर समाजलक्ष्मी काम शुरू किया गया।

18 वी शताब्दी महोत्सव की महत्वपूर्ण बातें –

  18 से 20 लाख दर्शनार्थीयों ने दर्शन का लाभ लिया
  लोगों ने माँ के चरणों में 52 लाख रूपए अर्पण किए
  कडवा पाटीदार समाज माताजी की ध्वजा के नीचे एक जुट हुआ। भक्ति भाव और भाई चारा बढा
  संस्कारी प्रजा का संस्कारी महोत्सव बना
  कडवा पाटीदार समाज के लिए जागृति का महायज्ञ बना
  माँ के आशीर्वाद से सभी सुखी, समृद्ध और आबाद हुए। सभी के जीवनस्तर में सुधारहुआ।
  बालिका शिक्षा अभियान शुरु हुआ
  वर्ष में एक बार माँ उमिया के दर्शन के लिए आना शुरु हुआ
  कडवा पाटीदार समाज महोत्सव से समाज में गणनापात्र बना
  कडवा पाटीदार समाज के विकास पथ का प्रथम सोपान बना और ऐतिहासिक प्रसंग बा।

महोत्सव के बाद का माताजी संस्थान –
18वी शताब्दी महोत्सव के बाद श्री उमिया माताजी संस्थान ऊंझा सभी कडवा पाटीदार समाज के लिए आस्था और श्रद्धा का केन्द्र बना। संस्थान के कार्यकर्ताओं ने धर्म के साथ समाज की भलाई को अपना फर्ज माना जिससे समाज के विकास के लिए विभिन्न प्रवृत्ति पर विचार हुआ।

सबसे पहले इस महोत्सव के एकत्र धनराशि का उपयोग यात्री सुविधा के लिए किए जाने पर विचार हुआ। ईसवी संवत 1977-78 में आधुनिक सुविधायुक्त पथिकाश्रम और भोजनालय माताजी परिसर में बनाया गया। इसका उद्घाटन 17-5-78 को शेठ शरी हरिप्रसाद दुर्गाप्रसाद लश्करी के हाथों हुआ। पथिकाश्रम में 36 कमरे, 3 स्टोर रूम, एक सभा होल और एक बडा होल तैयार कराया गया। भोजनालय में एक साथ 400 यात्रियों के बैठ कर खाने की व्यवस्था की गई। भोजन गैस चुल्हा से बनाने की भी व्यवस्था हुई। साथ ही मंदिर में चांदी का मटका, गुल्लक तथा भगवान घर का दरवाजा बनाया गया। चांदी का दरवाजा 369 किलो चांदी से बनाया गया।

टावर के बगल में 17 लाख के खर्च से भव्य कार्यालय बनाया गया। उसके उपर यात्रियों के ठहरने के लिए 12 कमरे और एक सभा होल बनाया गया। माताजी के दक्षिण भाग में एक सत्संग होल भी बनाया गया। दान में दी गई जमीन के बदले सत्संग होल पर पटेल तलशीदास जोरदार रुसात का नाम लिखा गया।

इसके बाद मानसरोवर पर यात्रियों के लिए अलग 30 कमरे बनाए गए, जिसमें से तीन में एसी की सुविधा है। इसके अलावा अंबाजी, बहुचराजी और सोला अहमदाबाद में पथिकाश्रम बनाया गया।

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